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तूतीकोरिन में पुलिस फ़ायरिंग और पिटाई में मारे गए 13 लोगों की मौत पर जारी हंगामे पर वेदांता के प्रमुख अनिल अग्रवाल का कहना है कि कुछ निहित स्वार्थ वाले लोग उनकी कंपनी वेदांता और भारत को बदनाम करना चाहते हैं.
तूतीकोरिन में वेदांता ग्रुप की कंपनी स्टरलाइट कॉपर के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों पर पुलिस फ़ायरिंग और लाठीचार्ज में अब तक 13 लोग मारे जा चुके हैं. ये विरोध लंबे समय से जारी है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्टरलाइट कॉपर प्लांट से निकलने वाला खतरनाक औद्योगिक कचरा ज़मीन, हवा और पानी में प्रदूषण फैलाने के अलावा उनके स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचा रहा है जिससे लोगों की मौत भी हुई है, और वो चाहते हैं इसे बंद किया जाए. कंपनी इन आरोपों से इनकार करती है. तूतीकोरिन में अभी भी पुलिस भारी संख्या में मौजूद है और इंटरनेट कटा हुआ है. राज्य सरकार ने घटना की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ईके पलानीस्वामी ने भी गुरुवार को कहा था कि कुछ राजनीतिक नेता और असामाजिक तत्व प्रदर्शनों में घुस गए हैं और इसे ग़लत रास्ते पर ले गए हैं. इस वक्तव्य की सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना हुई थी. अनिल अग्रवाल ने गुरुवार को ट्विटर पर जारी एक वीडियो संदेश में तूतीकोरिन की घटनाओं को "दुर्भाग्यपूर्ण" और दुख देने वाला बताया था. अपने वीडियो संदेश में अनिल अग्रवाल ने कहा था कि वो ये बिज़नेस लोगों की मर्ज़ी से आगे बढ़ाना चाहेंगे और ये उनकी समृद्धि के लिए है.
पर्यावरण के मुद्दे पर सवाल के जवाब में वेदांता का कहना है,"कंपनी स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़े कड़े मानकों का पालन करती है और पिछले सालों में कंपनी ने प्रशासन और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के सभी नियमों का पालन किया है." स्थानीय लोग और कार्यकर्ता कंपनी के इन दावों को ग़लत बताते हैं. क्या घटना में मारे गए लोगों की मदद के लिए उनकी मदद की योजना है, इस पर अनिल अग्रवाल की ओर से सीधा जवाब नहीं मिला और कहा गया कि, "इस संकट के मौके पर तूतिकोरिन के लोगों को जो भी मदद चाहिए होगी हम उनकी मदद करेंगे." कंपनी ने सरकार और प्रशासन से आसपास के इलाकों में रहने वाले समुदायों और हमारे कर्मचारियों की सुरक्षा की अपील की है." तमिलनाडु के तूतीकोरिन से पहले उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में भी अपने निवेश को लेकर वेदांता विवादों में रही है. ऐसा क्यों है, इस पर पूछे गए सवाल का बिहार के पटना में पैदा हुए अनिल अग्रवाल ने कोई जवाब नहीं दिया.
चार लाख टन तांबे का उत्पादन करती है स्टरलाइट
जिस तरह तूतीकोरिन में पुलिस की ओर से लोगों पर गोलियां चलाई गईं और उन्हें पीटा गया, इस पर ऐसे आरोप भी लगे कि स्थानीय पुलिस और प्रशासन पर वेदांता का प्रभाव है जिसके कारण प्रशासन और पुलिस की ओर से ऐसी कार्रवाई हुई. अनिल अग्रवाल ने इन आरोपों को नकारते हुए कहा, "देश के कई कोनों में और दुनिया के कई देशों में हमारे ऑपरेशंस चल रहे हैं. हम अपना बिज़नेस न्यायोचित तरीके से चलाने में विश्वास रखते हैं, न कि प्रशासन पर कोई प्रभाव डालकर." वेदांता दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनियों में से एक है. अनिल अग्रवाल ने मुंबई में वेदांता नाम की कंपनी बनाई थी जिसे उन्होंने लंदन स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर्ड कराया. स्टरलाइट वेदांता समूह की ही कंपनी है. तूतीकोरिन वाले कारखाने में हर साल चार लाख टन तांबे का उत्पादन होता है. कंपनी इसकी क्षमता दोगुना करना चाहती है. तमिलनाडु प्रदूषण कंट्रोल बोर्ट ने कंपनी को बंद करने के आदेश दिए हैं. प्लांट की बिजली को भी काट दिया गया है.
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नईदिल्ली 25 मई 2018। गुटखा खाकर कहीं भी थूकने वाले लोग अब होशियार हो जाएं। मोदी सरकार के स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत अभियान के यूजीसी ने एक नए अभियान की शुरुआत की है। यूजीसी ने सार्वजनिक जगहों पर थूकने की आदत को सामाजिक समस्या बताते हुए, इसके खिलाफ आवाज उठाने को कहा है।
फाइन का है प्रावधान
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देश के सभी विश्वद्यालयों से सार्वजनिक जगहों पर ‘थूकना मना है’ अभियान चलाने को कहा है। यूजीसी का कहना है कि स्वच्छ भारत अभियान में प्रावधान है कि सार्वजनिक जगहों पर थूकने वाले लोगों पर सरकारी एजेंसियां फाइन लगा सकती हैं। लेकिन प्रावधान होने के बावजूद कुछ नहीं बदला है, जिसके चलते सरकार ने इस मुद्दे पर अलग से अभियान चलाने की पहल की है।
युवा बढ़ाएं जागरूकता
यूजीसी ने हाल ही में देश के सभी केन्द्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों को एक सर्कुलर जारी करके कहा है कि कहीं भी थूकने की आदत से टीबी जैसे संक्रामक रोग हो सकते हैं। यूजीसी के मुताबिक सार्वजनिक स्थानों पर थूकना एक गंभीर समस्या है और हम लोगों में से अधिकांश रोजाना ऐसा होते हुए देखते हैं। यूजीसी ने अपने सर्कुलर के जरिए अपील की है कि जनता में जागरूकता बढ़ाने के लिए देश का युवा इसमें अहम भूमिका निभा सकता है।
‘निकाली जाएं रैलियां’
यूजीसी ने अपने सर्कुलर में छात्रों से थूकने, कचरा फैलाने, हरियाली को नुकसान पहुंचाने और सार्वजनिक जगहों पर स्मोकिंग रोकने के लिए रैलियां निकालने और पब्लिक इवेंट के जरिए अभियान चलाने के लिए कहा है।
एनएसएस वॉलेंटियर्स भी लें हिस्सा
इसके अलावा यूजीसी ने अधिकांश कॉलेजों में चलने वाले नेशनल सर्विस स्कीम (एनएसएस) के वॉलेंटियर्स से भी इस सामाजिक समस्या पर हिस्सेदारी निभाने के लिए कहा है। साथ ही यूजीसी ने यह भी कहा है कि कैंपस में पोस्टर और स्टीकर्स के जरिए बताया जाए कि ऐसे लोग जो तंबाकू का सेवन करते हैं, उनके थूकने से कई संक्रामक बीमारियां दूसरों को हो सकती हैं। सर्कुलर में यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों और संबंधित कॉलेजों से इस विषय पर जरूरी कदम उठाने का आदेश भी दिया है।
स्वास्थ्य मंत्री ने दिया था आइडिया
दो साल पहले केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने संसद में इस मुद्दे पर जागरूकता फैलाने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि इस पर अभियान चलाने के लिए अलग से बजट की कोई व्यवस्था नहीं हैं, ले
::/fulltext::नई दिल्ली: मोदी सरकार 26 मई को चार साल पूरे कर रही है. इस मौके पर जहां मोदी सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस मोदी सरकार की नाकामियों को उजागर करने की कोशिश कर रही है. यही वजह है कि 26 मई को जहां बीजेपी और मोदी सरकार अपने 4 साल के कार्यकाल का सफलतापूर्वक जश्न मनाएगी, वहीं कांग्रेस इस दिन को 'विश्वासघात दिवस' के रूप में मनाएगी. यानी इस मौके पर सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल चलेगा. मगर इसके इतर बात करें तो मोदी सरकार ने भले ही कई सारे काम किये हों, योजनाओं की शुरुआत की हो, मगर उनकी नाकामियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. मोदी सरकार की उपलब्धियों में अगर एक से बढ़कर एक फैसले और योजनाएं शामिल हैं, तो उनकी नाकामियों की फेहरिस्त भी छोटी नहीं है. मोदी सरकार की नाकामियों का जिक्र करना यहां इसलिए भी जरूरी है क्योंकि 2014 में कांग्रेस की नाकामियों को गिनाकर और कई सारे वादे कर के ही मोदी सरकार सत्ता में आई थी. 1984 के बाद 2014 का चुनाव पहला मौका था, जब देश की जनता ने किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत दिया, और देश की आज़ादी के बाद पहला मौका था, जब किसी गैर-कांग्रेसी दल को लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ. इसलिए यह जरूरी है कि इस सरकार की नाकामियों पर भी एक नजर दौड़ाई जाए ताकि लोगों को पता चले कि इन चार सालों में मोदी सरकार किन-किन मोर्चों पर विफल रही है और कई सारी उपल्बधियों के बीच भी ये नाकामियां चीख-चीख कर बोल रही हैं और मोदी सरकार की पोल खोल रही है.
तो चलिये एक नजर डालते हैं मोदी सरकार की इन बड़ी नाकामियों पर...
पेट्रोल-डीजल का दाम सातवें आसमान पर:
पेट्रोल-डीजल के बढ़े दाम से देश में हाहाकार है. मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद पेट्रोल सबसे महंगा हुआ है. जबकि मोदी सरकार सत्ता में आने से पहले यह कहती रही कि उनकी सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम कांग्रेस की सरकार से भी कम कर देगी. हैरान करने वाली बात ये है कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम है, बावजूद इसके भारत में तेल की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं. तेल की कीमतों में किस तरह से आग लगी हुई है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि महाराष्ट्र के परभणी में 24 मई को पेट्रोल 87.27 रुपये प्रतिलीटर पहुंच गया. यानी कि मोदी सरकार का महंगाई कम करने का वादा भी सिर्फ वादा ही साबित हुआ.
कश्मीर घाटी में अशांति
सत्ता में आने से पहले बीजेपी के दो सबसे बड़े हथियार थे कश्मीर मुद्दा और पाकिस्तान. इन दो मुद्दों में से एक कश्मीर घाटी में मोदी सरकार की लगातार कोशिश के बावजूद भी पिछले लंबे समय से जारी आशांति और हिंसक माहौल अब भी जारी है. कांग्रेस की सरकार से अगर तुलना करें तो मोदी सरकार के कार्यकाल में घाटी की हालत बद से बदतर हुई है. लागातार पत्थरबाजी और अशांत माहौल का मोदी सरकार ने सामना किया है. घाटी में शांति कायम करने में मोदी सरकार विफल रही है. यह नाकामी और भी बड़ी इसलिए हो जाती है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन कर बीजेपी सरकार में है, और केंद्र के साथ-साथ राज्य में बीजेपी की सरकार होने के बाद भी अभी कुछ खास सफलता हाथ नहीं लगी है.
पाकिस्तान पर मोदी सरकार का स्टैंड
मोदी सरकार के नेताओं और खुद पीएम मोदी के तेवर पाकिस्तान के प्रति 2014 से पहले काफी सख्त हुआ करते थे. 2014 से पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने हर चुनावी भाषण में पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने की बात की. साथ ही यह वादा किया कि उनकी सरकार बनते ही पाकिस्तान के साथ बॉर्डर पर होने वाले सीजफायर उल्लघंन के मामलों में कमी आएगी, मगर ताजा हालात पर नजर दौड़ाएं तो सीजफायर उल्लंघन के मामले में कोई कमी नहीं आई है. पाकिस्तान की सीमा की ओर से लगातार सीजफायर तोड़े जा रहे हैं. पाकिस्तानी गोलीबारी में न सिर्फ आम नागरिकों की मौत हो रही है, बल्कि हमारे कई जवान भी शहीद हो रहे हैं. हालांकि, मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक कर अपने मंसूबों को जाहिर किया, मगर बावजूद इसके ठोस रणनीति के अभाव में सीमा पर लगातार गोलीबारी और हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं. यह बात भी सही है कि पीएम मोदी ने दोनों देश के बीच के रिश्ते को सुधारने की कोशिशों के क्रम में लाहौर भी गये, मगर उसका नतीजा सिफर ही रहा. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान के मुद्दे पर मोदी सरकार अपने एजेंडे और वादे से भटक गई है, जो वह 2014 से पहले कहा करती थी.
कालेधन पर सरकार फेल
याद कीजिए 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले के पीएम मोदी के भाषण को. चुनावी रैलियों में पीएम मोदी का एक भी भाषण ऐसा नहीं होता था, जो बिना कालेधन के जिक्र के संपन्न हो जाए. मगर आज हकीकत सबके सामने है. पीएम मोदी अपने भाषणों में कहा करते थे कि उनकी सरकार जब सत्ता में आएगी तो विदेशों में जमा भारतीय लोगों का कालाधन वो ले आएंगे और यह कालाधन इतना अधिक होगा कि सरकार हर व्यक्ति को 15 -15 लाख रुपये देगी. मोदी सरकार के चार साल पूरे हो गये, मगर अब भी लोगों को इस बात का इंतजार है कि विदेशों से कालाधन कब आएगा और उससे अधिक तो लोगों को इस बात का इंतजार है कि उनके अकाउंट में 15 लाख रुपये कब आएंगे, जिसका वादा चुनाव से पहले पीएम मोदी ने किया था. इस मामले पर मोदी सरकार की यह सबसे बड़ी नाकामी है कि अभी तक न सरकार को पता है कि विदेशों में कितना कालाधन जमा है और वे कब तक देश में आएंगे.
बेरोजगारी के मुद्दे पर मोदी सरकार बैकफुट पर
अगर मोदी सरकार आज सत्ता में है, और चार साल का सत्ता सुख भोग लिया है, तो उसकी मुख्य वजह बेरोजगारी का मुद्दा, जिसके सफल प्रयोग से बीजेपी ने कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंका. मोदी सरकार ने चुनावी घोषणा पत्र में हर साल 2 करोड़ रोजगार का वादा किया था, मगर रोजगार सृजन के मामले में मोदी सरकार औंधे मुंह गिरी है. यही वजह है कि बेरोजगारी के मुद्दे पर बीजेपी और मोदी सरकार बैकफुट पर नजर आती है. बेरोजगारी के मुद्दे पर जब मोदी सरकार फंसी तो पकौड़े बेचने को भी रोजगार की श्रेणी में ले आई और अपनी उपलब्धि बताने लगी. सच तो यह है कि रोजगार के सृजन का वादा मोदी सरकार नहीं निभा पाई है.
नोटबंदी से कोई फायदा नहीं
प्रधानमंत्री ने नोटबंदी जैसा ऐतिहासिक फैसला तो लिया, लेकिन इस फैसले का परिणाम सिफर रहा. इस फैसले से न सिर्फ आम लोगों को परेशानी हुई, बल्कि कई जिंदगियां भी इस दौरान काल के गाल में समा गईं. पीएम मोदी ने कालेधन, भ्रष्टाचार पर चोट करने के उद्देश्य से नोटबंदी जैसा बड़ा फैसला लिया. लेकिन न तो कालाधन खत्म हुआ और न ही भ्रष्टाचार में कमी देखने को मिली. नोटबंदी की विफलता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक भी कह चुका है कि मार्केट में मौजूद पुराने नोट करीब 99 फीसदी वापस आ गये हैं. तो अब इस स्थिति से देखा जाए तो बकौल मोदी सरकार मार्केट फैले में जाली नोटों का क्या हुआ और देश में छुपे कालेधन का क्या हुआ? क्या नोटबंदी से भ्रष्टाचार पर लगाम लगा, क्या इससे देश की अर्थव्यवस्था में कोई बदलाव आया?
भगवान भरोसे नमामि गंगे परियोजना
प्रधानमंत्री ने काफी उत्सुकता के साथ नमामि गंगे प्रोजेक्ट को लॉन्च किया और 20,000 करोड़ रुपये का बजट दिया. लक्ष्य 5 साल का रखा गया लेकिन मिनिस्ट्री ऑफ वॉटर रिसोर्सेज के डेटा की मानें तो नमामि गंगे प्रोजेक्ट में काफी धीमी गति से काम हुआ है. 2014 से 17 के आंकड़ों पर गौर करें तो सरकार द्वारा बीते तीन सालों में 12 हजार करोड़ रुपये का बजट देने की बात कही गई, जिसमें से वास्तव में केवल 5378 करोड़ रुपये ही बजट में दिए गए. बजट में जारी 5378 रुपये में से केवल 3633 करोड़ रुपये खर्च के लिए निकाले गए और इसमें से केवल 1836 करोड़ 40 लाख रुपये ही वास्तव में खर्च किए गए. इतना ही नहीं, इस परियोजना की बदतर के मद्देनजर इसके मंत्री का भी पदभार बदल दिया गया.
आदर्श ग्राम योजना फेल
आदर्श ग्राम योजना के तहत हर सांसदों के द्वारा पांच गावों को गोद लेने की व्यवस्था है, जिसमें 2016 तक प्रत्येक सांसद एक-एक गांव को विकसित बनाएंगे और बाद में 2019 तक दो और गांवों का विकास होगा, मगर मोदी सरकार के चार साल पूरे हो गये, लेकिन एक भी गांव आदर्श ग्राम की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया है. जबकि अब तक बीजेपी के ही कितने सांसद एक गांव को विकसित कर पाए हैं और उसे आदर्श बना पाएं हैं, यह हकीकत किसी से छुपी नहीं है. दूसरी पार्टियों के सांसदों की बात तो बहुत दूर की है, बीजेपी के सांसद अभी तक डेटलाइन पर काम पूरा नहीं कर पाए हैं.
नेपाल से रिश्ते खराब
मधेसियों के मुद्दे पर भारत का नेपाल के साथ रिश्ते काफी तल्ख हो गये. जब नेपाल के नये संविधान में मधेसियों ने प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर आंदोलन किया, तो उस वक्त भारत ने भी उनका साथ दिया. इसका नतीजा हुआ कि नेपाल सरकार से भारत के रिश्ते खराब हो गये. मधेसी आंदोलन के समय भारत ने पेट्रोल, दवा और अन्य सामानों की आपूर्ति को भी रोक दिया था. जिसके बाद चीन को नेपाल में पैर फैलाने का मौका मिल गया. भारत ने जब जरूरी सामानों की आपूर्ति रोक दी, तब चीन ने नेपाल की मदद की. इतना ही नहीं, नेपाल के मामले में भारत की दखलअंदाजी को नेपाल ने अपनी संप्रभुता के खिलाफ माना था. यही वजह है कि नेपाल को उस वक्त न सिर्फ चीने ने सामानों से मदद की थी, बल्कि सहानुभूति भी दी थी. तभी से नेपाल का चीन के प्रति सॉफ्ट रवैया दिखता है.
देश की आंतरिक सुरक्षा भी नहीं सुधरी
मोदी सरकार आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर भी काफी कमजोर साबित हुई है, ये बात अलग है कि मोदी सरकार ने सत्ता में आने से पहले काफी ऊंचे स्वर में कहा कि उनकी सरकार सत्ता में आने के बाद नक्सलियों का सफाया कर देगी, नक्सलवाद का खात्मा कर देगी. मगर छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र में समय-समय पर जिस तरह से नक्सली हमले हो रहे हैं, उसने मोदी सरकार की विफलता को उजागर कर दिया है. बीते साल अप्रैल में छत्तीसगढ़ के सुकमा में एक साथ 25 सीआरपीएफ जवानों शहीद हो गये थे. साल 2010 के बाद यह बड़ा नक्सली हमला था. इतना ही नहीं, समय-समय पर मोदी सरकार के कार्यकाल में लगातार नक्सली हमले होते रहे हैं, जिसमें हमारे जवानों ने अपनी जान गंवाई है.
नई दिल्ली: देशभर के करीब 10 लाख से ज्यादा बैंककर्मियों ने वेतन वृद्धी की मांग को लेकर हड़ताल पर जाने की घोषण कर दी है। इस देशव्यापी हड़ताल में सरकारी एवं नीजी दोनों क्षेत्रों के बैंक कर्मी शामिल होंगे। हड़ताल 30 मई से शुरू होगी और 31 मई को चलेगी। हड़ताल की जानकारी ऑल इंडिया बैंक एम्पलाइज एसोसिएशन (एआईबीईए) ने दी है। बता दें कि बैक कर्मी वेतन संशोधन की मांग कर रहे हैं, इनका वेतन संशोधन 1 नंवबर, 2017 को ही तय किया जाना था।
असफल रही वेतन संशोधन की बैठक
एआईबीईए के महासचिव सीएच वेकंटचलम ने बताया कि यूएफबीयू और आईबीए के बीच वेतन संशोधन को लेकर मुंबई में 5 मई को हुई बैठक असफल रही। यूबीएफयू बैंकिंग क्षेत्र की 9 यूनियनों की एक नेतृत्वकारी संस्था है, जो बैंककर्मियों और अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करती है। फिलहाल 'हड़ताल की सूचना बैंक प्रबंधन की प्रतिनिधि संस्था, इंडियन बैंक एसोसिएशन (आईबीए) और मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय), नई दिल्ली को दे दिया गया है।
वेतन बिल पर 2 फीसदी की वृद्धि की मांग
आईबीए ने 31 मार्च, 2017 को बैंकों के कुल वेतन बिल पर 2 फीसदी की वृद्धि की पेशकश की थी, जबकि पिछले 10वें द्विपक्षीय मजदूरी निपटारे में, जो एक नवंबर, 2012 से प्रभावी था, आईबीए कुल वेतन बिल में 15 फीसदी की वृद्धि करने पर सहमत हुआ था। वेंकटचलम ने कहा कि यूनियनों ने आईबीए के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। सरकार ने आईबीए से एक नवंबर, 2017 से पहले वेतन संशोधन समझौते को पूरा करने के लिए कहा था, लेकिन इसमें देरी हो रही है।
कोलकाता, 23 मई 2018। पुरी-हावड़ा शताब्दी एक्सप्रेस का नाश्ता खाने से 40 यात्रियों की तबियत खराब हो गई। इनमें से 14 यात्रियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना बुधवार सुबह की है। रेलवे प्रशासन का कहना है कि इस मामले की जांच करवाई जाएगी। ये सभी यात्री ट्रेन के कोच नंबर सी-1 और सी-2 में सफर कर रहे थे और इन्हें नाश्ता सुबह करीब सात बजे के बाद दिया गया था। यात्रियों ने नाश्ते के बाद जब पेट दर्द और उल्टी की शिकायत की तो ट्रेन के खड़गपुर पहुंचने पर करीब 11.45 बजे रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया गया।
दक्षिण-पूर्व रेलवे के चीफ पब्लिक रिलेशन ऑफिसर संजॉय घोष ने बताया, ‘यह खाना आईआरसीटीसी ने सप्लाई किया था और ट्रेन में पुरी से रखा गया था। इसे खाने के बाद कुछ यात्रियों की तबियत खराब हो गई। उन यात्रियों का खड़गपुर में इलाज चल रहा है। इस मामले में आईआरसीटीसी और हमारी ओर से जांच की जाएगी।’
वहीं खड़गपुर डिविजनल के डीआरएम के. राबिन कुमार रेड्डी ने बताया, ‘खाने के सैंपल ले लिए गए हैं और हम लोग इस मामले में जरूरी कार्रवाई करेंगे। इसके अलावा हम इस मामले की भी जांच करेंगे कि क्या वेंडर ने बाहर से खाना तो नहीं लिया है।’ जहां रेड्डी का कहना है कि कुछ यात्री हॉकर्स से भी खाना ला सकते हैं, वहीं यात्रियों का कहना है कि उन्होंने वही खाना खाया है जो ट्रेन में परोसा गया है।
एक यात्री काकाली सेनगुप्ता ने कहा, ‘हमें भुवनेश्वर के बाद ट्रेन में ऑमलेट और ब्रेड परोसा गया था। इसे खाने के बाद हमारे पेट में दर्द शुरू हो गया और हम में से काफी लोगों को उल्टी होना शुरु हो गई।’ काकाली का अपने पति रूपम सेनगुप्ता के साथ अस्पताल में इलाज चल रहा है। उनके दो बच्चे भी ट्रेन में नाश्ता का सेवन करने के बाद बीमार पड़ गए थे। ट्रेन पुरी से सुबह करीब 5.45 बजे निकली थी और नाश्ता 7 बजे परोसा गया था।
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